एनके सिंह की अध्यक्षता वाले 15वें वित्त आयोग की रिपोर्ट इस वर्ष के अंत तक आने वाली है। जानकारों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 15वां वित्त आयोग क्या सिफारिशें देगा। सरकारी खर्च के तमाम अनुमान भी इन सिफारिशों पर निर्भर करेंगे। जब 2015 से 2020 के पांच वर्षों के लिए केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के बंटवारे को लेकर 14वें वित्त आयोग को लागू किया गया, तो वह एक बड़ा बदलाव था। 15वां वित्त आयोग जब अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप देने में लगा है, उस पर राज्यों का यह दबाव है कि उन्हें ज्यादा हिस्सा मिले। गौरतलब है कि राज्यों की हमेशा यह चाहत रही है कि हर अगले वित्त आयोग में उसे केंद्रीय करों में पहले से ज्यादा हिस्सा मिले। हालांकि कुछ अर्थशास्त्री राज्यों की करों में ज्यादा हिस्से की मांग को यह कहकर सही मानते हैं कि केंद्र सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए इन कल्याणकारी कार्यक्रमों को चलाती है और इसका राजनीतिक लाभ भी उठाती है। इन अर्थशास्त्रियों का यह तर्क उचित जान नहीं पड़ता, क्योंकि हमें समझना होगा कि केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, सभी का उद्देश्य जनता का कल्याण होता है, तो चाहे वह केंद्र सरकार के माध्यम से हो अथवा राज्य सरकार के। यदि केंद्र सरकार सुसंगत तरीके से कार्यक्रम लेती है, तो उससे लोगों की हालत में सुधार होता है। उज्ज्वला, बिजली की सभी तक पहुंच, ग्रामीण सड़कें, ग्रामीण गृह निर्माण आदि इसके कुछ उदाहरण हैं। हालांकि ऐसा सभी परिस्थितियों में नहीं कहा जा सकता, लेकिन अधिकांशतः यह देखा गया है कि जब से राज्यों को केंद्र से ज्यादा हिस्सा मिलना शुरू हुआ है, तब से उनके द्वारा वास्तविक सामाजिक कल्याण योजनाएं घटी हैं और लोकलुभावन स्कीमों में खासी वृद्धि हुई है। जहां एक ओर केंद्र के पास राजस्व जुटाने के बहुत से साधन हैं, राज्यों की जिम्मेदारियों के अनुपात में उनके पास संसाधन कम हैं। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार अपने अंतर्गत चलने वाले सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश कर संसाधन जुटा रही है, जबकि राज्यों के पास एक ओर तो यह विकल्प नहीं है, तो दूसरी ओर राज्य सरकारें अपने अंतर्गत चलने वाले विद्युत बोर्डों के नुकसान की भरपाई तो कर ही रही हैं, उज्ज्वल डिस्काम एश्योरेंस योजना (उदय) के तहत अपने बिजली बोर्डों का पुनर्गठन करने के लिए केंद्र सरकार से ऋण लेने के कारण दबाव में हैं। एक प्रकार के पूंजीगत खर्चों को भी उन्हें वहन करना पड़ता है। ऐसे में राज्य केंद्रीय करों में ज्यादा हिस्सा चाहते हैं, लेकिन हमें समझना होगा कि यदि राज्य सरकारें वित्तीय बोझ से ग्रस्त हैं, तो केंद्र सरकार भी बहुत अच्छी वित्तीय स्थिति में नहीं है। पिछले वर्ष ही केंद्र सरकार को अपेक्षा से एक लाख 70 हजार करोड़ रुपए कम प्राप्त हुए। ऐसे में केंद्र सरकार को अपने जरूरी खर्च चलाने के लिए ही कठिनाई हो रही है और अब उस खर्च की भरपाई के लिए विदेशों से भी ऋण लेने की योजना बनाई जा रही है। इसलिए राज्यों द्वारा केंद्रीय करों में पहले से ज्यादा हिस्से की उम्मीद करना सही नहीं होगा। गौरतलब है कि केंद्र सरकार वित्त आयोग को संदर्भ के रूप में शर्तें देती है। अन्य विवादास्पद शर्तों के अतिरिक्त एक शर्त यह लगाई गई थी कि 15वां वित्त आयोग जनगणना के 2011 के अनुमानों का उपयोग करेगा। अभी तक 1971 की जनगणना के आंकड़े ही इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। ऐसे में दक्षिण के राज्य चिंतित हैं कि अब नए आंकड़ों के अनुसार उत्तर भारत की जनसंख्या ज्यादा होने के कारण उनका हिस्सा केंद्रीय करों में कम हो जाएगा, इसलिए वे शर्तों में इस बदलाव को नहीं होने देना चाहते। आशा है कि वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अपनी सिफारिशें देगा।

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