Arun jaitley

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली का शनिवार को दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। हाजिर जवाब, दूरदर्शी, जिंदादिल और आम आदमी के प्रति संवेदनशील सोच वाले जेटली छात्र जीवन से राजनीति से जुड़े थे। सड़क से लेकर संसद तक जेटली का मददगार और मानवीय पक्ष लोगों को भाता रहा। मौजूदा दौर में उनके कलेवर के नेता भाजपा ही नहीं बल्कि पूरी भारतीय राजनीति में बहुत कम हैं। प्रधानमंत्री के लिए तो जेटली हर मर्ज की दवा बन गए थे। तभी तो कल (शनिवार) रात बहरीन में भारतीयों को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भावुक होकर कहा कि ‘बहुत दबाव में बोल पा रहा हूं। आज मेरा प्यारा दोस्त अरुण मुझसे बहुत दूर चला गया और मैं बहरीन में हूं।’ बात सही है। अरुण जेटली हर बार भाजपा और सरकार के संकटमोचक नजर आते थे। चाहे बहस संसद में हो या फिर सड़क पर। जवाब देने के लिए अक्सर जेटली ही नुमाया होते थे। अरुण जेटली राजनेता के अलावा जाने-माने वकील भी थे।

अपने बहुआयामी अनुभव के कारण वह केंद्र में मोदी की पहली सरकार का मुख्य चेहरा रहे। सरकार की नीतियों और योजनाओं का बखान हो या विपक्ष की आलोचनाओं के तीर को काटने की जरूरत, हर मामले में जेटली आगे दिखते थे। जेटली ने 2019 के आम चुनाव को जिस तरह ‘स्थिरता और अराजकता’ के रूप में निरूपित कर भाजपा-राजग अभियान को एक कारगर हथियार दिया वह उनकी राजनीतिक समझ के पैनेपन का एक उदाहरण है।

दिसंबर 1952 में दिल्ली में जन्मे जेटली ने दिल्ली के सेंट जेवियर्स से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री पूरी करने से पहले श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में आगे की शिक्षा हासिल की। उनके पिता किशन जेटली दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में वकालत करते थे। जेटली ने भी कानून की पढ़ाई की और अपने पिता का साथ देने लगे। मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे जेटली ने बाद में वकील दोस्त राजीव नायर के साथ मिलकर दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत शुरू की।

राजनीति में जेटली की दीक्षा 1991 में हुई जब वह भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने। वह 1999 में भाजपा के प्रवक्ता बने। दलीय राजनीति में किसी पार्टी का प्रवक्ता बननेवाले वह पहले वकील थे। 2014 में वित्तमंत्री पद संभालने से पहले जेटली उत्तरी क्षेत्र से बीसीसीआई के उपाध्यक्ष थे। उन्होंने 1977 में दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। सत्तर के दशक में जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय कैंपस में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र नेता रहे। 1974 में वह दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष बने। 1975 में इमरजेंसी का विरोध करने पर उन्हें 19 महीने तिहाड़ जेल की हवा खानी पड़ी थी। जेटली जयप्रकाश नारायण के 1973 में शुरू किए गए भ्रष्टाचार के खिलाफ सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रमुख नेता थे। कई साल तक भाजपा के प्रवक्ता रहे जेटली ने 47 साल की उम्र में संसद में प्रवेश किया था। तब वह गुजरात से राज्यसभा में मनोनीत किए गए थे।

भारतीय जनता पार्टी को मौजूदा मुकाम दिलाने का श्रेय मोदी और अमित शाह की जोड़ी को जाता है, तो इस जोड़ी की दुश्वारियों को दूर करते हुए मंजिल की तरफ रास्ता सपाट बनाये रखने का क्रेडिट सिर्फ अरुण जेटली को मिलेगा। 2002 के गुजरात दंगों को लेकर मोदी को जिन भी कानूनी चुनौतियों का सामना कर पड़ता, अरुण जेटली संकटमोचक बन कर हर बाधा दूर कर देते रहे। सिर्फ संकटमोचक ही नहीं, मोदी के गुजरात में रहते और फिर दिल्ली तक के सफर में जेटली अमित शाह के साथ उनके सारथी बने रहे। भारतीय जनता पार्टी, मोदी सरकार और खासकर मोदी-शाह के लिए अरुण जेटली ‘ट्रबलशूटर यानी ‘संकटमोचक’ थे।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से लेकर मोदी सरकार तक अरुण जेटली की भूमिका और कद में कोई कमी नहीं आई। लोकसभा चुनाव से पूर्व जब सड़क से संसद तक कांग्रेस राफेल मुद्दे को उछाल रही थी, तब अरुण जेटली इस्पात की दीवार की भांति संसद में सरकार की ढाल बने। राहुल गांधी राफेल डील पर सवालों के गोले दाग रहे थे। मसला डिफेंस से जुड़ा था। कायदे से तो सवालों का जवाब रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण को देना था। मगर, सरकार की तरफ से तर्कों और सवालों की ढाल-तलवार लेकर अरुण जेटली खड़े हुए। जेटली ने राहुल गांधी के तीखे सवालों से सरकार का पक्ष इतने प्रभावी तरीके से रखा कि हर तरफ उनकी भूमिका की चर्चा और प्रशंसा हई।

गुजरात के गोधरा में 2002 में दंगा हुआ तो बीजेपी के शीर्ष नेताओं में अगर कोई तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में खड़ा हुआ तो वह अरुण जेटली ही थे। जब अटल जी मोदी के खिलाफ कार्रवाई की सोच रहे थे, तब जेटली ने आडवाणी को ऐसा करने से रोकने का अनुरोध किया था। वैसे तो मोदी की जेटली से जान-पहचान पहले से थी, मगर इस घटना ने मोदी को जेटली के ज्यादा नजदीक ला दिया। 2005 में सोहराबुद्दीन शेख का बहुचर्चित एनकाउंटर हुआ। इसमें गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह फंसे। गोधरा में मोदी और कथित फेक एनकाउंटर में फंसे अमित शाह को डिफेंड करने में अरुण जेटली ने सक्रिय भूमिका निभाई।

अरूण जेटली ने 27 सितंबर 2013 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक चर्चित पत्र लिखा था। इस पत्र को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज भी अपनी वेबसाइट पर संभालकर रखा है। इस पत्र में अरुण जेटली ने यूपीए सरकार पर जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह को फंसाने का आरोप लगाया था। अपने पत्र में अरुण जेटली ने हरेन पांड्या से लेकर सोहराबुद्दीन, इशरत जहां, सोहराबुद्दीन आदि एनकाउंटर केस के जरिए बीजेपी के संबंधित नेताओं को फंसाने का आरोप लगाया था।

लोकसभा चुनाव दौरान बिहार में एनडीए के बीच सीटों की शेयरिंग का जब पेंच फंसा तो यहां भी अरुण जेटली संकटमोचक की भूमिका में दिखे। उन्होंने रामविलास पासवान से करीब घंटे भर मीटिंग कर सीटों का पेंच सुलझा लिया था। अरुण जेटली ऐसे नेता थे, जिनके विपक्ष के नेताओं से भी अच्छे रिश्ते रहे। यही वजह है कि कई बार जब लोकसभा में किसी बिल के मसले पर सरकार को विपक्ष से बातचीत करने को मजबूर होना पड़ा है तो जेटली को ही आगे किया गया। विवादित भूमि अधिग्रहण बिल का मामला नजीर है। ललित गेट प्रकरण में आरोपों की बौछार झेल रहीं सुषमा स्वराज के बचाव में भी जेटली पुरजोर तरीके से सामने आए थे।

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा अक्सर सुनने में आती है कि मई, 2014 में नरेंद्र मोदी सत्ता में आए तो एक प्रकार से वह दिल्ली के लिए ‘आउटसाइडर’ ही थे। दिल्ली की राजनीति में मोदी को जमाने, विपक्षी नेताओं से संबंध सुधारने के अलावा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से रिश्ते मधुर बनाने में जेटली ने बड़ी भूमिका निभाई थी। यही वजह है कि अमृतसर से 2014 का लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद भी उन्हें वित्तमंत्री बनाया गया। 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के अस्तित्व में आने के बाद अरुण जेटली को 3 अहम मंत्रालय वित्त, रक्षा और सूचना-प्रसारण मंत्रालय का प्रभार दिया गया था। यह उनमें मोदी के भरोसे का प्रमाण है।

मोदी सरकार के प्रमुख रणनीतिकार माने जाने वाले जेटली ने इस बार खराब सेहत की वजह से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। 2014 में वह अपना पहला लोकसभा चुनाव अमृतसर से हार गए थे। शुगर की समस्या से ग्रस्त जेटली की हालत पिछले साल मई में किडनी ट्रांसप्लांट के बाद लगातार बिगड़ती चली गई। गत 22 जनवरी को जेटली ने अमेरिका में एक सर्जरी कराई थी। बताया गया कि यह उनके बांये पैर में सॉफ्ट टिश्यू कैंसर के लिए की गई थी। इस कारण से उन्होंने मोदी सरकार का छठा और इस कार्यकाल का अंतिम बजट पेश नहीं किया। बजट पेश किए जाने के दौरान वह अमेरिका में कैंसर का इलाज करा रहे थे। पिछले कुछ सप्ताह में उनकी सेहत ज्यादा बिगड़ गई।

67 साल के अरुण जेटली को सांस लेने में तकलीफ होने के बाद 9 अगस्त को एम्स में भर्ती किया गया था। 24 अगस्त को उन्होंने दिल्ली एम्स के अंतिम सांस ली। उनके सहयोगी प्रकाश जावड़ेकर ने एक बार उन्हें ‘सुपर स्ट्रेटजिस्ट’ (उच्चतम रणनीतिकार) कहा था। मोदी ने 2014 की अमृतसर (पंजाब) की चुनाव रैली में जेटली को ‘बेशकीमती हीरा’ कहा था। भारत के राजनीतिक दृश्य-पटल पर चार दशक तक एक प्रखर और मुखर नेता तथा कुशल रणनीतिकार के रूप में छाए रहे सौम्य छवि के धनी अरुण जेटली का निधन भारतीय राजनीति के लिये अपूरणीय क्षति है।

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