solar

ऊर्जा की खपत से विकास को मापने के इस दौर में ऊर्जा उत्पादन के तरीकों पर गहराई से विचार करने की जरूरत है। क्या हम व्यापक विस्थापन, भारी पर्यावरण विनाश और असीमित आर्थिक बदहाली की कीमत पर पारम्परिक ताप, जल और परमाणु ऊर्जा को तरजीह देंगे या फिर लगभग शून्य विस्थापन, पर्यावरण-मित्र और अपेक्षाकृत सस्ती, गैर-पारम्परिक ऊर्जा से अपनी जरूरतें पूरी करेंगे? हफ्ता-डेढ़ हफ्ता पहले हम पर्यावरणीय असंतुलन का दुष्प्रभाव भीषण गर्मी के रूप में देख-भुगत रहे थे और ठीक इन्हीं दिनों में बस्तर के बैलाडीला में आदिवासियों ने ‘नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कार्पोरेशन’ (एनएमडीसी) को आवंटित एक लौह अयस्क खदान के खिलाफ विरोध फांद रखा था। इसके पहले ओडिशा के नियामगिरी आंदोलन में आदिवासियों ने एक खनन परियोजना का विरोध किया था जिसे बाद में सरकार ने रद्द कर दिया था। प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए देशभर में आदिवासियों और सरकार के बीच इसी तरह के तीखे संघर्ष होते रहते हैं, लेकिन इनको अनदेखा कर, पर्यावरणीय असंतुलन का दुष्प्रभाव सामने आने के बावजूद हम लगातार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं। ऐसे में इन संघर्षों के कारण और इसके विकल्पों को समझना जरूरी है। सरकार और आदिवासियों के बीच संघर्षों की प्रमुख वजह राजस्व में वृद्धि के अलावा ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करना है। प्रमुख रूप से बिजली और ईंधन के रूप में उपभोग की जाती ऊर्जा की मांग घरेलू, कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही है। इसका एक प्रमुख कारण देश की बढ़ती जनसंख्या भी है। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यूएनओ) द्वारा तैयार नवीनतम अनुमान बताते हैं कि भारत की जनसंख्या वर्ष 2030 तक 1.5 अरब का आंकड़ा पार कर जाएगी। वर्ष 2018 में भारत सरकार के ‘सांख्यिकी और कार्यक्रम मंत्रालय’ द्वारा प्रकाशित 20वीं ‘ऊर्जा सांख्यिकी रिपोर्ट’ के अनुसार वर्ष 2011-12 से 2016-17 के बीच प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत भी 3.54 प्रतिशत बढ़ गई है। ऊर्जा के उपभोग का प्रमुख क्षेत्र औद्योगिक रहा है जहां ऊर्जा के सभी स्रोतों, खासकर पेट्रोलियम और बिजली का 58 प्रतिशत उपभोग किया जाता है। औद्योगिक क्षेत्र में चाहे वह विनिर्माण क्षेत्र हो या सेवा क्षेत्र, बिजली मुख्य जरूरत होती है। बिजली की मांग न केवल औद्योगिक क्षेत्र में, बल्कि घरेलू और कृषि क्षेत्र में भी है। बिजली के उत्पादन में मुख्य रूप से परंपरागत और गैर-परम्परागत स्रोत हैं। परंपरागत स्रोतों से बिजली के उत्पादन की प्रमुख कठिनाइयां पर्यावरणीय हैं जिनमें पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव और विस्थापन प्रमुख हैं। भारत सरकार के ‘केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण’ की अप्रैल-2019 की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रतिवर्ष, प्रतिव्यक्ति 1, 181 किलोवाट बिजली का उपभोग किया जाता है। बिजली उत्पादन के आंकड़े प्रतिदिन बदलते रहते हैं और उसका बाजार भी अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति के नियम’ पर आधारित हो गया है। भारत सरकार के ‘राष्ट्रीय पावर पोर्टल’ के अनुसार वर्तमान स्थिति में देश में 3, 56, 817.60 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है, जो कुल मांग से 2.41 प्रतिशत कम है। देश में परम्परागत स्रोतों, जिसमें 63.41 प्रतिशत ताप-विद्युत (थर्मल-पॉवर), 12.70 प्रतिशत पन-विद्युत (हाइड्रो-पॉवर) उत्पादित की जा रही है। ताप-विद्युत संयंत्रों की पर्यावरणीय चुनैतियां हैं। देश के केवल सार्वजनिक क्षेत्र के 128 ताप-विद्युत स्टेशनों में रोज करीब 18.17 लाख टन कोयले की खपत हो रही है। कोयले से बिजली उत्पादन पर्यावरण के लिए कितना घातक है, इसे अमेरिका के ‘वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीच्यूट’ के सुब्रत चक्रवर्ती द्वारा वर्ष 2018 में प्रकाशित शोधपत्र से समझा जा सकता है। देश में प्रति व्यक्ति ऊर्जा उत्सर्जन चार प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। हमारी ऊर्जा जरूरतों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग और उसके दुष्परिणाम पर्यावरणीय असंतुलन और संयंत्रों के तीखे विरोध के रूप में सामने हैं। ऐसे में बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारे सामने क्या विकल्प हैं, इसे समझना जरूरी है। क्या गैर-परम्परागत ऊर्जा परियोजनाएं बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहतर विकल्प हो सकती हैं? दुनियाभर में बायोमास, बायोगैस, दीप्तिमान ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, वायु ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा आदि गैर-परम्परागत स्रोतों से बिजली पैदा की जाती है। देश में 21.96 प्रतिशत बिजली गैर-परम्परागत स्रोतों के माध्यम से पैदा की भी जा रही है, जिसमें प्रमुख रूप से विंड (50.53 प्रतिशत), सोलर (35.74 प्रतिशत) और बायोमास (13.73 प्रतिशत) हैं। विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा और विकसित तकनीक के परिणाम स्वरूप वर्ष 2010 से अब तक विंड ऊर्जा में 20 प्रतिशत और सोलर ऊर्जा में लगभग 75 प्रतिशत केपिटल-कास्ट कम हो गई है। अक्षय उर्जा के क्षेत्र में अनुभव रहा है कि प्लांटों को लगाते समय पर्यावरणीय हितों से समझौता कर लिया जाता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में चार हजार हेक्टेयर से अधिक ऐसे जंगलों में विंड इकाईयां लगाई गईं जो पश्चिमी घाट से जुड़े थे। बिजली उत्पादन के गैर-परंपरागत स्रोतों को कुछ इस तरह स्थापित करना होगा जिससे पर्यावरणीय और मानवीय पक्षों की अनदेखी होने की लापरवाहियां न होने पाएं। इन लापरवाहियों के परिणाम स्वरूप मानव सभ्यता और धरती के अस्तित्व पर बन आई है। सरकार को इनके महत्त्व और पर्यावरण पर प्रभाव को समझना होगा।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published.