एक ऐसे समय जब विभिन्न रूपों में भारत राष्ट्रीयता और धर्म निष्ठा पर सेकुलर अतिवादी हमले बढ़ रहे हैं कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा का मुख्य मंत्री बनना बहुत महत्वपूर्ण है। पद संभालते ही उन्होंने हिन्दू हंता टीपू की जयन्ती के विद्रूप सेकुलर समारोह को रद्द कर अखिल भारतीय प्रशंसा अर्जित कर ली। दक्षिण में जिहादी, कम्युनिस्ट और वेटिकन के धर्मान्तरण वादी हिन्दुओं के विरुद्ध एक अलिखित आक्रामक रवैया अपनाए हुए हैं। हिन्दुओं का अपमान और उनका धर्मान्तरण उन तत्वों का मुख्य खेल है। येदियुरप्पा के सत्तासीन होने से अपने धर्म और सभ्यता पर निष्ठा के नाते सम्मान पूर्ण जीवन जीने की आकांक्षा रखने वाले भारतीयों का मनोबल बढ़ेगा। भारत की राष्ट्रीय चेतना में विश्वास रखने वालों को मजबूत बनाने से बड़ा आज कोई दूसरा राजधर्म नहीं है।

येदियुरप्पा पग पग पर भीतरी और बाहरी चुनौतियों का सामना करते रहे। विधानसभा में स्पष्ट बहुमत न आने पर उनके राजनीतिक जीवन की ही समाप्ति घोषित करने वालों की कमी नहीं थी। दिल्ली में उन पर फब्तियां कसी जाती थीं कि वे अंग्रेजी नहीं जानते। संसद में उनसे मेरी अक्सर भेंट हो जाती थी। वे शान्त और मितभाषी ही रहते थे। पर उनके चेहरे पर एक उद्विग्नता दिखती थी जो उनकी स्वयं को सही सिद्ध करने की उस जिद्द का परिचायक थी जो उन पर लगे विपक्षी आरोपों से जन्मी थी।

येदियुरप्पा आज देश के उन एकाध मुख्यमंत्रियों में अग्रणी हैं जो वास्तव में जन नेता यानी अंग्रेजी में मास लीडर हैं। उनका साधारण जन से साधारण भाषा में असाधारण संवाद होता है। यह गुण बहुत कम नेताओं के पास होता है। ज्यादातर राजनेता धन और मीडिया के भरोसे अपनी राजनीति चलाते हैं। पर येदियुरप्पा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मीडिया उनके समर्थन में है या धुर विरोध में। उनकी सम्पदा है सामान्य जन। बात यहीं से शुरु होती है और यहीं तक समाप्त। वे गहरे दुख से भाजपा से अलग होने पर भी अपने वोट को अक्षत बचाए रहे। और जैसे बैंक एकाउंट होता है वैसे ही भाजपा में वापस आने पर वो वोट प्रतिशत वैसे का वैसा भाजपा में स्थानांतरित हो गया।

80 के निकट पहुंच रहे येदियुरप्पा पर संभवतः उनके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती अब शुरू हुई है। न केवल अपनी सरकार को हिचकोलों और तूफानों से बचाना है बल्कि कर्नाटक को सबसे शानदार शासन भी देना है। अटलजी ने मुझसे एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्हें केवल यशस्वी शासन देने का सपना है। सत्ता तो बहुतों के पास आई और गयी। यशस्वी वही हुआ जिसने सर्वस्व जनहित को समर्पित किया। कर्नाटक एक महान प्रदेश है। ज्ञान विज्ञान प्रौद्योगिकी में भारत में अग्रणी कर्नाटक विश्व में अग्रणी बनते बनते क्यों रूका। कर्नाटक के गांवों में टेक्नालाजी और कृषि का कितना बड़ा योगदान हुआ? कन्नड भाषा संस्कृति और विरासत के संरक्षण की चुनौती है। सेकुलर विष के प्रभाव से प्रदेश को डी-टोक्सीफाई करना और बेंगलूरू जैसे महानगरों की गरिमा लौटाना प्राथमिकता होनी चाहिए। चाहे कितना और कैसा भी दबाव क्यों न हो भाजपा सरकार हर वर्ग, जाति और मजहब को मानने वालों के लिये समान न्याय और सम्मान देने वाली होनी चाहिए। इसी में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय का अनुगमन निहित है। कर्नाटक की सफलता मोदी और शाह के नेतृत्व में दक्षिण में भाजपा शासन बढ़ाने में सहायक होंगी। कर्नाटक तो शुरुआत है। अभी तमिलनाडु, केरल, आंध्र और तेलंगाना बाकी हैं।

महाकवि कूवेम्पू द्वारा रचित कर्नाटक राज्य गीत राष्ट्रीय एकता का येदियुरप्पा के सामने सफल होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। उन्हें याद रखना होगा कि यह वही कर्नाटक है जहां एक समय भाजपा और संघ के कार्यकर्ता को अपमानित और तिरस्कृत किया गया था। जहां सेकुलर तालिबानों ने शिव मूर्ति पर मल-मूत्र किया और यहां होने वाली हर हिंसा को आंख मूंदकर हिंदू कार्यकर्ताओं के मत्थे मढ़ दिया। यह वह कर्नाटक है जहां हिंदू धर्म के प्रति अगाध एवं अंतिम सांस तक अडिग रहने वाली निष्ठा को यादवराव जोशी, ओ.वे. शेषाद्रि, सूर्यनारायण राव और जनसंघ के वरिष्ठ नेता जगन्नाथ राव जोशी जैसे विराट व्यक्तियों ने अपनी साधना से सिंचित किया और उन कार्यकर्ताओं का निर्माण किया जिसके शब्दकोश में मूल्यों से समझौता या हिंदू विरोधियों के सामने झुकने जैसे शब्द थे ही नहीं। जो इन्हें याद रखेगा और उसकी आंखों में कर्नाटक के विकास और नवीन अभ्युदय का चित्र स्पष्ट होगा तथा वह कर्नाटक का अमर नेता बन जाएगा। कर्नाटक अब अस्थिर सरकारों के युग से तंग आ चुका है, उसे एक सूरज की प्रतीक्षा है।

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