कांग्रेस ने नदी जल विवाद संबंधी विधेयक में राज्यों से संवाद का प्रावधान नहीं होने को संविधान पर आघात बताया

नई दिल्ली, 31 जुलाई । लोकसभा में बुधवार को कांग्रेस ने अंतर्राज्यिक नदी जल विवाद संशोधन विधेयक को लेकर सरकार पर राज्यों से विचार विमर्श नहीं करने का आरोप लगाते हुए कहा कि इसमें राज्यों से विचार विमर्श करने का प्रावधान नहीं होना, संविधान पर ‘‘आघात’’ है। भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह विधेयक संविधान में प्रदत्त प्रावधानों के तहत लाया गया हैं। पार्टी ने कहा कि इस विधेयक में दशकों से अधिकरणों में जल विवाद के लंबित रहने की स्थिति को देखते हुए समसीमा के भीतर मामलों के निपाटरे पर खास जोर दिया गया है। विधेयक पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस के मनीष तिवारी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 262 में विभिन्न राज्यों के बीच नदी जल विवाद का निपटारा करने से जुड़ा उपबंध है। लेकिन इस अनुच्छेद को ध्यान देखे तब इसके दर्शन में स्पष्ट है कि राज्यों के साथ चर्चा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि लेकिन इस विधेयक को लाने से पहले राज्यों के साथ चर्चा होनी चाहिए थी लेकिन तथ्य यह है कि सरकार ने ऐसा नहीं किया। ‘‘यह संघीय ढांचे पर आघात है।’’ कांग्रेस सांसद ने कहा कि कहा गया है कि 70 वर्षो में 9 में से 4 अधिकरणों ने ही फैसला (अवार्ड) दिया। पांच अधिकरणों ने फैसला नहीं दिया और एक अधिकरण 33 साल में अवार्ड नहीं दे पाया। उन्होंने कहा कि विधेयक में कहा गया है कि यह समय की बचत करने के मकसद से लाया गया है। लेकिन यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इसमें दो स्तरीय ढांचे का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा छोटी छोटी बेंच बनाने की भी बात कही गई है। इससे तो समय अधिक लगेगा। तिवारी ने कहा कि इसमें राज्यसभा में विपक्ष के नेता अथवा लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को शामिल करने का प्रावधान नहीं किया गया। क्या सरकार चाहती है कि इसमें उसके अनुकूल विचार वाले लोग ही शामिल हों। उन्होंने कहा कि मूल कानून में अधिकरण में भारत के प्रधान न्यायाधीश को सदस्यों को चुनने का अधिकार है और इसमें उच्चतम न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश को भी शामिल करने की बात कही गई है। लेकिन संशोधन में इसे हल्का बनाने का प्रयास किया गया है। कांग्रेस सदस्य ने आंकड़ा जुटाने के कार्य को आउटसोर्स करने पर आपत्ति व्यक्त की। चर्चा में हिस्सा लेते हुए भाजपा के सत्यपाल सिंह ने कहा कि पिछले 60-70 वर्षो में देश में नदियों के पानी से जुड़़े विवाद सामने आते रहे हैं। इस बारे में गठित अधिकरणों ने फैसले सुनाने में 10 वर्ष, 17 वर्ष और एक मामले में तो 33 वर्षो से सुनवाई चल रही है। उन्होंने कहा कि यह ध्यान देने की बात है कि मनुष्य ने नहरें, कुएं आदि बनवाये लेकिन नदियां, समुद्र आदि प्रकृति प्रदत्त हैं। इसलिये कोई भी राज्य यह नहीं कह सकता कि उस पर किसी खास राज्य का अधिकार है। सिंह ने कहा कि संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विभिन्न राज्यों से बहने वाली नदी या स्थित नदी घाटी या उसमें जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण के संबंधित विषय पर केंद्र को कानून बनाने का अधिकार है। भाजपा सदस्य ने कहा कि पहले अधिकरण में केवल न्यायिक क्षेत्र के सदस्य होते थे लेकिन अब न्यायिक क्षेत्र के लोगों के साथ विषय विशेषज्ञ भी होंगे। उन्होंने कहा कि समय की जरूरत हो देखते हुए अब अधिकरण का स्वरूप स्थायी बनाने का भी उपबंध किया गया है। सत्यपाल सिंह ने पाकिस्तान के साथ भारत की जल संधि का विषय उठाया और पूछा कि क्या सरकार इसकी समीक्षा करेगी? उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से समयसीमा के भीतर निर्णय को सुनिश्चित किया जा सकेगा।

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