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इसमें कोई दो राय नहीं है कि कश्मीर मसले पर कांग्रेस पूरी तरह कंफ्यूज है। संसद के दोनों सदनों में बिल पास होने से लेकर आज तक इस मसले पर कांग्रेस कई दफा अपना स्टैण्ड बदल चुकी है। राज्यसभा में जिस दिन कश्मीर से जुड़े बिल पेश किये गए, कांग्रेस को समझ ही नहीं आया। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने विवादित बयान देकर ‘सेल्फ गोल’ दाग दिया। चौधरी के बयान से पार्टी की जमकर किरकिरी हुई। सोनिया गांधी भी चौधरी के बयान से नाराज हो गईं। संसद से बाहर राहुल गांधी, अधीर रंजन चौधरी, मणिशंकर अय्यर, गुलाम नबी आजाद आदि कांग्रेस नेताओं ने कश्मीर मुद्दे पर विवादित बयानबाजी की। राहुल की विवादित टिप्पणियों को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में दिए अपने प्रस्ताव में आधार बना लिया है। इससे देशभर में कांग्रेस की किरकिरी हो रही है। हालांकि कांग्रेस इस मुद्दे पर साफ तौर पर बंटी हुई दिखी। डॉ. कर्ण सिंह, जनार्दन द्विवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मुरली देवड़ा, भूपेन्द्र हुड्डा, शशि थरूर, जतिन प्रसाद और आरपीएन सिंह जैसे कई नेताओं ने पार्टी लाइन से इतर मोदी सरकार के निर्णय का समर्थन किया।

संसद में हुई फजीहत और पार्टी के अंदर से उठती विरोधी आवाजों के दबाव में पार्टी ने इस मुद्दे पर अपना स्टैण्ड बदल लिया। पार्टी ने यह फैसला लिया कि वह अब कश्मीर से अनुच्छेद 370 को बेअसर करने का विरोध करने की बजाय, उसको समाप्त करने के मोदी सरकार के तरीके का विरोध करेगी। अनुच्छेद 370 हटाये जाने के मुद्दे पर कांग्रेस पहले दिन से असमंजस की स्थिति में है। पार्टी को समझ नहीं आ रहा कि वो मोदी सरकार के इस फैसले का विरोध करे या फिर समर्थन। जब कांग्रेस अपने वोट बैंक की तरफ देखती है तो उसे लगता है कि विरोध करना चाहिए। जब उसके अंदर से ही विरोध की आवाजें उठनी लगी तो उसे लगता है कि विरोध तो करना चाहिए लेकिन उसका तरीका दूसरा होना चाहिए। विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने अनुच्छेद 370 के बीज बोए थे, वह आज भ्रम की स्थिति में है।

कांग्रेस नेता कश्मीर को लेकर विवादित बयान देने से बाज नहीं आ रहे। अधीर रंजन चौधरी ने मोदी सरकार पर कश्मीर को कॉन्सेंट्रेशन कैंप बनाने का आरोप मढ़ा। राहुल गांधी ने तो ‘कश्मीर में खून-खराबा हो रहा है, वहां से हिंसा की खबरें आ रही हैं, लोग मर रहे हैं’ जैसा विवादित बयान दे डाला। पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने इस मसले में हिन्दू-मुस्लिम एंगल ढूंढ लिया। मणिशंकर अय्यर ने एक अखबार में लेख लिखकर मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा, ‘नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने देश के उत्तरी बॉर्डर पर एक फिलीस्तीन बना दिया है।’ कांग्रेस नेताओं के बयान पाकिस्तान को अच्छे लगने लगे हैं। वह उसी को मुद्दा बना रहा है। लेकिन कांग्रेस को शर्म नहीं है। मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले से कांग्रेस बदहवासी की स्थिति में है।

कांग्रेस ही नहीं बल्कि किसी भी दल ने यह सोचा नहीं होगा कि अनुच्छेद 370 जैसे संवेदनशील मुद्दे पर मोदी सरकार कोई फैसला ले पाएगी। जब गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कश्मीर से जुड़े एक के बाद एक चार बिल पेश किये तो, कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष के पांवों तले से जमीन खिसक गई। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का सरकार को कोसने का कोई बहाना चाहिए, इसलिए वो किसी न किसी तरह से इस मुद्दे पर सरकार को घेरने से बाज नहीं आ रहे हैं। विपक्ष अभी तक लोकसभा चुनाव के गहरे सदमे से उबर नहीं पाया है। वह बरसों-बरस पुरानी, सड़ी-गली सोच और विचार के साथ जनता को बरगलाना चाह रहा है। सोशल मीडिया से लेकर जमीन पर मोदी सरकार के काम-काज ने जनता की आंखें खोलने का काम किया है। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत जनता का मूड ही तो बताती है, लेकिन अफसोस विपक्ष इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पा रहा है।

मोदी तो ‘आलोचना के प्रोडक्ट’ हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से लेकर देश का प्रधानमंत्री बनने तक मोदी राष्ट्रनिर्माण के पवित्र संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। और विपक्ष, केवल मोदी की आलोचना में लगा है। पिछले पांच-सात सालों में विपक्ष की जितनी आलोचना और विरोध नरेन्द्र मोदी ने झेली है, वैसा दूसरा उदाहरण भारतीय राजनीति में पढ़ने-सुनने को नहीं मिलता है। अचरज इस बात का है कि मोदी का जितना तीव्र विरोध हुआ, उनका कद भी उतना ज्यादा बढ़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के ‘चौकीदार चोर है’ के नारे को मोदी ने ‘मैं भी चौकीदार’ से पूरी तरह भोथरा कर डाला। कांग्रेस के ‘अब होगा न्याय, 72 हजार के वादे और चौकीदार चोर जैसी बड़ी मुहिम के बावजूद नतीजा सबके सामने है। देश के डेढ़ दर्जन से ज्यादा राज्यों में कांग्रेस का एक भी सांसद नहीं है। लोकसभा में 52 की संख्या पर सिमटी कांग्रेस इस हालत में पहुंचने के बावजूद लोकभावना को नहीं समझ रही है।

2014 में केंद्र की सत्ता गंवाने के बाद से एक-एक करके देश के तमाम राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बेदखल होती गई। इससे कांग्रेस में भारी कुंठा है। नतीजतन, भाजपा के खिलाफ पार्टी का आला नेतृत्व उटपटांग रणनीति बना रहा है। असमंजस की स्थिति इस हद तक है कि भाजपा का विरोध करते-करते कांग्रेस कब देश का विरोध करने लगती है, उसे यही पता नहीं लगता। कांग्रेस के इस आचरण से देश के एक बड़े तबके में उसके प्रति गहरी नाराजगी का भाव है।

आज कांग्रेस लोकतंत्र की हत्या से लेकर कश्मीरियों की आवाज दबाने की बातें कर रही है। ऐसे में सवाल यह है कि जब घाटी से कश्मीरी पण्डित उजाड़े जा रहे थे तो तब कांग्रेस को लोकतंत्र की हत्या होते क्यों नहीं दिखी? क्यों कांग्रेस ने उस समय विरोध नहीं किया? क्यों कांग्रेस कश्मीरी पण्डितों के साथ खड़ी नहीं हुई? कांग्रेस नेता चिदम्बरम कह रहे हैं कि ‘जम्मू कश्मीर में मुस्लिम ज्यादा हैं, इसलिए केंद्र सरकार ने वहां से अनुच्छेद 370 के ज्यादतर प्रावधानों को हटाया है।’ चिदम्बरम ठीक ही कह रहे हैं। मुस्लिम बिरादरी के तुष्टिकरण के लिए ही कांग्रेस कश्मीरी पण्डितों के साथ खड़ी नहीं हुई। बेशर्मी की इंतिहा यह है कि आज वही कांग्रेस भाजपा पर तुष्टिकरण और जात-पात की राजनीति का आरोप लगा रही है। कांग्रेस को देश के सामने कश्मीर पर अपनी राय और सोच साफ करनी चाहिए। लेकिन कांग्रेस तो कश्मीर मसले पर केवल मगरमच्छी आंसू बहा रही है। अपने इस कुत्सित प्रयास में उसने विपक्ष के कई दलों का शामिल कर लिया है।

कश्मीर में शरारती तत्वों की मौजूदगी और पुराने खूनी रिकार्ड के मद्देनजर सरकार ने कश्मीर में सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त कर रखे हैं। अमन की राह में कोई रूकावट ने आये इसलिए आवाजाही से लेकर टेलीफोन, मोबाइल व इन्टरनेट सेवाओं पर रोक लगा दिया था। जिसे धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। किसी भी नेता को कश्मीर जाने की इजाजत नहीं दी गयी। कश्मीर में बकरीद और स्वतंत्रता दिवस शांतिपूर्वक बीत चुका है। छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो पिछले तीन हफ्तों में कश्मीर में खून-खराबे की कोई बड़ी घटना सामने नहीं आयी है। जैसे-जैसे कश्मीर में माहौल शांत हो रहा है, कांग्रेस समेत विपक्ष के कई दलों के पेट में बल पड़ रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस समेत विपक्ष के कुछ दल नहीं चाहते कि कश्मीर में शांति बहाल हो। इसलिए रूक-रूककर बयानों के गोले दागे जा रहे हैं। स्थानीय प्रशासन की मनाही के बावजूद राहुल गांधी आठ दलों के 11 विपक्षी नेताओं के साथ श्रीनगर गए। प्रशासन ने उन्हें एयरपोर्ट से आगे नहीं बढ़ने दिया। उन्हें बैरंग वापस दिल्ली भेज दिया गया। रोक के बावजूद राहुल ने कश्मीर पहुंचकर अपनी नाकामियों की किताब में एक अध्याय और जोड़ दिया।

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By admin

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