poem

आओ सजन, अब तो मेरे घर आओ सजन!

तेरे दर्शन को तरसे है, मेरे भीगे नयन!

घर, दर सहित सजाया है, अपने मन का आँगन!!

आओ सजन, अब तो मेरे घर आओ सजन!!!

तू नहीं तो जग, क्यों सूना सूना सा लगता है!

तू नहीं तो हर कोई, पराया सा नजर आता है!

इतनी बड़ी दुनिया में कौन है यहाँ मेरा, तेरे बिन!

आओ सजन, अब तो मेरे घर आओ सजन!!!

बहुत घूम चूका मैं, मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे!

किसी अपने को न मिल पाया, मैं किसी भी द्वारे…!

कहीं भी तू न मिला, भटके है हर जगह मेरा मन!!

आओ सजन, अब तो मेरे घर आओ सजन!!!

जीवन में छाये है उदासी के साये बहुत गहरे!

सबने छला है मुझको तेरे नाम से, प्रभु मेरे!

अब तो तेरे मेहर की बरसात हो मेरे सूने आंगन!!

आओ सजन, अब तो मेरे घर आओ सजन!!!

बुल्ले शाह ने कहा था रमज सजन दी होर

आज समझा हूं कि, क्यों खींचे तू मुझे अपनी ओर!

तू ही मेरा सजन, बस तू ही मेरा सजन!

आओ सजन, अब तो मेरे घर आओ सजन!!!

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By admin

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