Finance-Minister-Nirmala-Sitharaman

हाल ही में 23 अगस्त को अर्थव्यवस्था की सुस्ती और पूंजी बाजारों के संकट को दूर करने के लिए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कई उपायों की घोषणा की। उपभोक्ता मांग और निवेश बढ़ाने के लिए विदेशी और घरेलू पोर्टफोलियो निवेशकों पर लगाया गया अधिभार वापस ले लिया गया है। बैंकों में नकदी बढ़ाने, सूक्ष्म, लघु एवं मझोली कंपनियों के लिए वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी रिफंड को आसान बनाने, संकट से जूझ रहे वाहन क्षेत्र को राहत देने और सभी पात्र स्टार्टअप कंपनियों तथा उनके निवेशकों को ऐंजल टैक्स से छूट देने की भी घोषणा की गई। सरकार के द्वारा अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए 32 नए उपायों की घोषणा की गई है। खासतौर से बाजार में नकदी बढ़ाने के लिए सरकारी बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपए दिए जाएंगे।

गौरतलब है कि गिरते हुए बाजार में सुधार के मद्देनजर वित्त मंत्री ने कहा कि बैंक दरों में कटौती का फायदा बैंक ग्राहकों को देने में तत्परता दिखाएंगे और ब्याज दर को रेपो दर से जोड़ेंगे। कहा गया है कि एमएसएमई क्षेत्र के बकाए के एकमुश्त भुगतान के लिए ज्यादा पारदर्शी नीति बनाई जाएगी। सरकार और सरकारी कंपनियां उनके 60 हजार करोड़ रुपए के बकाए का जल्द से जल्द भुगतान करेंगी। डीमैट खाता खोलने और म्युचुअल फंडों में निवेश के लिए आधार आधारित केवाईसी की अनुमति दी जाएगी। इतना ही नहीं स्टार्टअप इकाइयों की समस्याओं के समाधान के लिए सीबीडीटी के सदस्य के तहत एक विशेष विभाग का भी गठन किया जाएगा। वित्त मंत्री ने आवास एवं वाहन ऋण और उपभोग की वस्तुएं सस्ती करने के लिए भी उपायों की घोषणा की। सीतारमण ने यह भी कहा कि बैंक रेपो रेट और बाहरी मानक दरों से जुड़ी ऋण योजनाएं शुरू करेंगे, जिनसे आवास, वाहन और अन्य खुदरा ऋणों की किस्तें कम हो जाएंगी।

उद्योग जगत के लिए भी कार्यशील पूंजी सस्ती हो जाएगी। जीएसटी लागू होने से अब तक लंबित पड़े सभी मामले 30 दिन में निपटाए जाएंगे। एक अक्तूबर से इनकम टैक्स नोटिस समन कम्प्यूटर से जारी होंगे। निसंदेह बाजार में सुधार और अर्थव्यवस्था को धार देने के लिए सरकार से रणनीतिक कदमों की अपेक्षा की जा रही थी। नीति आयोग के द्वारा कहा गया था कि देश में आर्थिक सुस्ती को दूर करने के लिए लीक से हटकर कदम उठाने की जरूरत है। वस्तुतः देश की अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र मांग की कमी का सामना कर रहा है। स्थिति यह है कि पिछले माह जुलाई 2019 में टेक्सटाइल सेक्टर में जहां 30 फीसदी की बिक्री घटी, वहीं ऑटोमोबाइल सेक्टर में 19 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है। आंकड़ों के मुताबिक ऑटोमोबाइल सेक्टर पिछले 19 साल के सबसे बुरे दौर में है। दैनिक उपभोग का सामान, एफएमसीजी बनाने वाली विभिन्न कंपनियों का कहना है कि उपभोक्ता खर्च में कटौती कर रहे हैं, जिससे उपभोक्ता सामान की बिक्री प्रभावित हो रही है। देश में आर्थिक सुस्ती से कई क्षेत्रों में नौकरी में कमी का संकट खड़ा होते हुए दिखाई दे रहा है। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि पिछले एक वर्ष से वैश्विक आर्थिक सुस्ती के कारण भारत में भी आर्थिक सुस्ती का जो दौर चल रहा है उसमें और तेजी आती जा रही है और इसका देश की अर्थव्यवस्था की गतिशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि 31 जुलाई को विश्व बैंक के द्वारा दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आकार के आधार पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में भारतीय अर्थव्यवस्था पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था के पायदान से दो स्थान फिसलकर 7वीं अर्थव्यवस्था के पायदान पर पहुंच गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन और फ्रांस ने जीडीपी के आधार पर भारत को पीछे किया है। यह ध्यान दिया जाना होगा कि जीएसटी संबंधी खामियों के कारण भी भारतीय अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ी हैं। पिछले दिनों 30 जुलाई को भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने संसद में 2017-18 के लिए जीएसटी पर पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि जीएसटी संबंधी खामियों के कारण पहले साल के दौरान जीएसटी कर संग्रह सुस्त रहा। रिपोर्ट में कहा गया कि रिटर्न व्यवस्था और तकनीकी व्यवधान की जटिलता की वजह से बिल मिलान, रिफंड के ऑटोजनरेशन तथा जीएसटी कर अनुपालन व्यवस्था संबंधी भारी कमियां सामने आई हैं। प्रत्यक्ष करों संबंधी मुश्किलों का अर्थव्यवस्था पर असर दिखाई दे रहा है। निश्चित रूप से सरकार ने आर्थिक वृद्धि को पटरी पर लाने के लिए जिन नए उपायों की घोषणा की है, उनका शीघ्रतापूर्वक क्रियान्वयन जरूरी है। आर्थिक वृद्धि को बढ़ाने के लिए बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाना होगा। वैश्विक कारोबार में वृद्धि करनी होगी। टैक्स के प्रति मित्रवत कानून को नई राह देनी होगी। जीएसटी को सरल तथा प्रभावी बनाना होगा।

19 अगस्त को अखिलेश रंजन समिति ने नई प्रत्यक्ष कर संहिता, डायरेक्टर टैक्स कोड के, लिए जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी है, उसके मद्देनजर नई प्रभावी प्रत्यक्ष कर संहिता और नए आयकर कानून को शीघ्र आकार दिया जाना होगा। श्रम सुधारों को लागू किया जाना होगा। ग्रामीण विकास, सड़क निर्माण, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गतिशील करना होगा। निश्चित रूप से उद्योग-कारोबार को गतिशील करने के लिए यद्यपि आरबीआई के द्वारा ब्याज दरों में कटौती की गई है। लेकिन अभी और कटौती करने और अर्थव्यवस्था में और अधिक नकदी का प्रवाह बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि इससे आर्थिक चक्र को पटरी पर लाया जा सकेगा। वैश्विक सुस्ती के बीच रोजगार बढ़ाना सरकार की एक बड़ी चुनौती है।

देश में निर्यातकों को सस्ती दरों पर और समय पर कर्ज दिलाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी होगी। निर्यातकों को जीएसटी के तहत रिफंड संबंधी कठिनाइयों को दूर करना होगा। निर्यातकों के लिए ब्याज सबसिडी बहाल की जानी होगी। हम आशा करें कि मोदी सरकार के द्वारा बढ़ती हुई आर्थिक सुस्ती की सच्चाई को ध्यान में रखकर भारतीय अर्थव्यवस्था को सुस्ती के चिंताजनक दौर से बचाने के लिए 23 अगस्त को जिन 32 आर्थिक उपायों की घोषणा की है, उनके त्वरित और व्यावहारिक क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाएगा। साथ ही अर्थव्यवस्था को धार देने के लिए रियल एस्टेट, बुनियादी ढांचे और कर सुधारों से संबंधित कुछ और जरूरी आर्थिक उपायों की भी घोषणा की जाएगी। इससे देश की अर्थव्यवस्था गतिशील होगी। ऐसा होने पर वर्ष 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर यानी 350 लाख करोड़ रुपए वाली भारतीय अर्थव्यवस्था का जो चमकीला सपना सामने रखा गया है, उस सपने को साकार करने की दिशा में कदम तेजी से आगे बढ़ाए जा सकेंगे।

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By admin

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