Arun jaitley

पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली, अंततः पंचतत्त्व में विलीन हो गए। देह मिट्टी हो गई। यही प्रकृति का शाश्वत यथार्थ है, लेकिन वह जो विरासत छोड़ कर गए हैं, वह चिरंजीवी है। यह विरासत राजनीतिक भी है और प्रशासनिक फैसलों की भी है। अरुण जेटली भारत सरकार के वित्त मंत्री ही नहीं थे, बल्कि दर्जन भर मंत्रालयों का प्रभार उन्होंने संभाला था। जब 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाने का फैसला लिया, तो उनकी पसंद भी पूछी गई। बहरहाल उन्हें सूचना-प्रसारण मंत्री का दायित्व दिया गया। तब उन्होंने रेडियो पर जम्मू-कश्मीर की संस्कृति और आम जन-जीवन से जुड़ा विशेष कार्यक्रम शुरू किया था। उन्होंने सरकार के सूचना तंत्र में कई संशोधन किए। बाद में कानून मंत्री बनाए गए, तो कई पुराने, ब्रिटिशकालीन कानूनों को रद्द भी किया। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे व्यापक तौर पर स्वीकार किया और पांच सालों के दौरान करीब 1400 ऐसे कानून समाप्त किए, जो नए भारत में बिलकुल अप्रासंगिक थे। 2014 में नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री चुने गए, तो उन्होंने वित्त के साथ-साथ रक्षा मंत्रालय का दायित्व भी अरुण जेटली को दिया। खूब आलोचनाएं हुईं, लेकिन आज यह यथार्थ सामने मौजूद है कि उनके कार्यकाल के दौरान महंगाई की दर तीन फीसदी से कम रही, राजकोषीय घाटा औसतन 3.4 फीसदी रहा, बीमा-उड्डयन और रक्षा क्षेत्रों में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी गई। उनके दो फैसले बेहद विवादास्पद रहे-नोटबंदी और जीएसटी। दुष्प्रचार किया गया कि प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी की घोषणा करने से पहले वित्त मंत्री जेटली को विश्वास में नहीं लिया था। यह गलत साबित हुआ। नोटबंदी के लिए रणनीति तय करने में अरुण जेटली की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी। गौरतलब यह है कि नोटबंदी के कुछ महीनों बाद ही, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव थे। विशेषज्ञों का मानना था कि भाजपा को एक बड़ी चुनावी हार का सामना करना पड़ेगा। बेशक नोटबंदी से पीडि़त आम आदमी की तकलीफों की ढेरों रपटें टीवी चैनलों पर दिखाई गईं और प्रिंट मीडिया के विश्लेषण भी काफी आक्रामक थे, लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा ने एक और ऐतिहासिक जीत हासिल की। वित्त मंत्री जेटली ने नोटबंदी की पैरोकारी करते हुए प्रचार किया कि करदाताओं की संख्या लाखों में बढ़ी है, कर-संग्रह बढ़ा है, तो अर्थव्यवस्था भी मजबूत हुई है। अब मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान नोटबंदी कोई मुद्दा नहीं है। लगभग इतना ही विवादास्पद फैसला जीएसटी का था। स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े कर-सुधारों में जीएसटी का स्थान है। बेशक शुरू में इसे न समझने के कारण व्यापारियों ने इसका विरोध किया था, लेकिन जेटली ने जीएसटी परिषद बनाकर सभी दलों को एक साझा मंच पर लाकर भी ऐतिहासिक काम किया। इसके कारण देश में प्रचलित 17 टैक्स और 26 अधिभार समाप्त हो गए। अब ‘एक देश, एक कर’ की प्रणाली शुरू हो गई है। नतीजतन सरकार को लाखों करोड़ रुपए का लाभ हुआ है। अब जीएसटी में विभिन्न कर दरों में संशोधन करने के बाद स्थिति सामान्य हो गई है। बेशक अरुण जेटली बुनियादी तौर पर अर्थशास्त्री नहीं थे, लेकिन उन्होंने कई व्यवस्थाएं शुरू कीं। देश के आम बजट के साथ ही रेल बजट को एकाकार कर दिया। बजट की तारीख एक फरवरी तय की और पेश करने का वक्त बदल कर सुबह 11 बजे किया। पहले बजट शाम में पांच बजे पेश होता था। बैंकों का घाटा कम करने के मद्देनजर बैंकों का आपस में विलय कराया, नतीजतन बैंकों के एनपीए भी कम हुए, लेकिन अब भी यह बोझ काफी है। करीब 36 करोड़ नागरिकों को बैंक से जोड़ने वाली जन-धन योजना, युवा और अनौपचारिक स्वरोजगार के लिए मुद्रा योजना, फर्जी कंपनियों पर प्रहार करने वाला दिवालिया कानून, विनिवेश पर फैसला, मौद्रिक नीति कमेटी और क्रेडिट गारंटी योजना आदि फैसलों के पीछे वित्त मंत्री अरुण जेटली ही थे। आज हमारी अर्थव्यवस्था की स्थिति कुछ कमजोर बताई जा रही है, आर्थिक मंदी के आसार बताए जा रहे हैं, बाजार में नकदी कम हुई है, बढ़ोतरी दर कम हुई है, लिहाजा अर्थव्यवस्था के ‘अरुण’ फिर याद किए जा रहे हैं। हालात गंभीर नहीं हैं। इस साल के अंत तक अर्थव्यवस्था स्थिर और सामान्य हो जाएगी, लेकिन वित्त मंत्री रहते हुए जो प्रयोग अरुण जेटली ने किए थे, वह विरासत याद रहेगी।

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By admin

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